गुरु ग्रह का महत्व और पूजा

गुरु (बृहस्पति) गुरु (बृहस्पति) अंगिरा गौत्र के ब्राह्मण है। सिंधु देश के अधिपति है। उनका पितवर्ण है। पीताम्बर धारण किये हुए है। कमल पर बिराजमान है उनके हाथ में रुद्राक्ष, वरमुद्रा, शिला और दंड धारण किये हुए है। गुरु (बृहस्पति) के अधिदेवता ब्रह्मा है और प्रत्यधिदेवता इन्द्र है।

गुरु (बृहस्पति) का मंत्र :- ( ॐ क्लीं ह्रूं बृहस्पतये नमः ) ह्रीं बृहस्पतये नमः।

मंत्र के जितने जाप हो उसके दशांश का हवन होता है। गुरु के लिए हवन में पीपल के समिध का उपयोग होता है।
पुरुषजाति, गौरवर्ण,शुभग्रह,कफप्रकृति, पित्तवर्ण,मृदुप्रकृति, ईशान दिशा, के अधिष्ठाता देव है, गुरु ग्रह के देवता इन्द्र है। ऋतु हेमंत है, आकाश तत्त्व है , हृदय की शक्ति का कारक है , गुरु द्वारा सूजन, गुल्म आदि रोगों का कारक है। गृह, विद्या, पुत्र,पौत्रादि का विचार किया जाता है। गुरु (बृहस्पति) शुभ ग्रह है । पारलौकिक और आध्यात्मिक सुखों का कारक है । पीले रंग पे प्रभुत्व है। भाग्योदय वर्ष १६ और ४० है। शरीर धातु मेद(मोटापा), रत्न पुखराज, जाति ब्राह्मण, स्वाभाव मृदु, प्रकृति सम, कफ और वात, राशि भ्रमण लगभग १३ मास, नक्षत्र भ्रमण लगभग १६० दिवस, सत्वगुणी, दिन में बलशाली,विशोत्तरी महादशा १६ वर्ष, अष्टोत्तरी महादशा १९ वर्ष, देवता इन्द्र जपसंख्या १९,००० , दान :- चने की दाल, गुरुगृह की स्वगृही राशि धन और मीन।

गुरु ग्रह की मूलत्रिकोण राशि धन है। उच्चराशि कर्क नीच राशि मकर है। गुरुगृह की अस्त राशि मिथुन और कन्या है।
गुरुगृह के कारक भाव दूसरा, पांचवा, नवम, दशम और ग्यारहवां है। गुरूग्रह के मित्र ग्रह में सूर्य, चंद्र, मंगल है। सम ग्रह में शनि और राहु है, जबकि हुरु रह के शत्रु ग्रह में बुध और शुक्र गिने जाते है। गुरु ऋग्वेद के स्वामी है। मीठे-मधुर रस के साथ गुरु का सम्बन्ध है ।

गुरु ग्रह का मंत्र :- ॐ बृहस्पतये नमः। गुरु के स्थान में धनभंडार, देवस्थान । गुरूग्रह ज्ञान, धर्म, धन, भाग्य और संतान का कारक है। गुरु ग्रह पति तथा व्याकरण विद्या का कारक है। शुभ कार्य करने वाला है । गुरूग्रह मान, प्रतिष्ठा, आनंद, धर्मज्ञान और आत्मज्ञान तरफ प्रसारित करने वाला है। गुरूग्रह के रोग में पित्ताशय, तिल्ली, फेफड़े और हृदय में तकलीफ, बुखार, अपच, रक्तदोष इत्यादि आते है।

गुरूग्रह पूर्व दिशा में और दशम स्थान में बलशाली होता है। मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारा धार्मिक स्थान, तीर्थ स्थान और उनके साथ सम्बंधित सभी कार्य गुरु से सम्बंधित है। होटलो, रेस्टोरेंट, हलवाई काम, तेल-घी के व्यापर के साथ गुरूग्रह के सम्बन्ध है। गुरु का चौघड़िया शुभ है। गुरूग्रह सौरमंडल का सबसे महाकाय ग्रह है । राज दरबार में गुरूग्रह को सलाहकार या राजगुरु की पदविका मिली है। गुरूग्रह जिस स्थान पर दृष्टि करते है उस उस भाव को जिवंत और उस भाव से जुडी बातों की वृद्धि करता है।
गुरु ग्रह में शिक्षक, आचार्य, अध्यापक, संत, महात्मा, गुरुजन, कर्मकांडी, मंत्रपाठी, ज्योतिष, गांव के मुखिया, कोर्ट-कचेरी के जज, न्यायाधीश आदि का समावेश होता है। गुरूग्रह के पर्याय नाम :- जिव, प्रशांत, देवगुरु, वाचस्पति, इन्द्रमंत्री, बृहस्पति, देवेज्य, इज्य, अंगिरा, त्रिदेवेश, सुराचार्य, आर्य आदि।

गुरु तत्त्व ज्ञान

तत्त्व आकाश स्वभाव लघु
गुण सत्त्व संज्ञा सौम्य, शुभ
लिंग पुरुष वर्णजाति ब्राह्मण
प्रकृति वात, कफ कारक सन्तान, गुरु
धातुसार चर्बी अधिष्ठाता ज्ञान, सुख
पदवी राजगुरु, मन्त्री शरीर-चिह्न कमर, मूत्राशय
दिशा ईशान्य धातु सोना,
रत्न पुखराज धारण-समय सूर्योदय
स्वामी इन्द्र सजल-शुष्क सजल
शुभ भाव एकादश भाव भाव के कारक द्वितय पंचम नवम एकादश भाव
स्थान कोशस्थान ऋतु हेमन्त
मित्र ग्रह सूर्य चन्द्र मंगल सम ग्रह शनि
शत्रु ग्रह बुध शुक्र उच्च राशि कर्क
नीच राशि मकर मू.त्रि. राशि धनु
महादशा १६ वर्ष वक्री-मार्गी वक्री/मार्गी
वृक्ष पीपल दृष्टि पंचम सप्तम नवम

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