
2022-09-03
पितृ शांति एक व्यापक विषय है जिसके बारे में थोड़े से पूरा समझना अत्यंत कठिन है। फिर भी कुछ मुख्य बिंदुओं का स्पष्टीकरण मानव के हित के लिए, जिसके बारे में साधारणतया भांतियां या अज्ञान की वजह से कार्य की पूर्णता तथा उसका लाभ मिल नहीं पाता है, कुछ बिंदु निम्नलिखित हैं-
(1) श्राद्ध पक्ष को 16 श्राद्ध कहा जाता है, जो भाद्रपद माह की पूर्णिमा से प्रारंभ होता है तथा पूरे 16 दिन तक माना जाता है। इन 16 दिन श्राद्ध-तर्पण इत्यादि कार्य किए जाते हैं
१०/०९/२०२२ शनिवार भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा महालय प्रारंभ प्रतिपदा का श्राद्ध
११/०९/२०२२, रविवार द्वितीया का श्राद्ध
१२/०९/२०२२, सोमवार तृतीया का श्राद्ध
१३/०९/२०२२, मंगलवार चतुर्थी का श्राद्ध,
१४/०९/२०२२, बुधवार पंचमी का श्राद्ध, भरणी श्राद्ध, गया श्राद्ध
१५/०९/२०२२, गुरुवार षष्ठी का श्राद्ध, कृतिका श्राद्ध
१६/०९/२०२२, शुक्रवार सप्तमी का श्राद्ध
१७/०९/२०२२, शनिवार
१८/०९/२०२२, रविवार अष्टमी का श्राद्ध
१९/०९/२०२२, सोमवार अविधवा नवमी, सौभाग्यवती स्त्रियों का श्राद्ध
२०/०९/२०२२, मंगलवार दसमी का श्राद्ध
२१/०९/२०२२, बुधवार इन्दिरा एकादशी एकादशी का श्राद्ध
२२/०९/२०२२, गुरुवार द्वादशी का श्राद्ध, सन्यासीओं का श्राद्ध
२३/०९/२०२२, शुक्रवार त्रयोदशी का श्राद्ध, मघा श्राद्ध, दस साल से कम उम्र के बच्चों का श्राद्ध,
२४/०९/२०२२, शनिवार चतुर्दशी का श्राद्ध, अस्त्रों शस्त्रों से मरे हुए का श्राद्ध, अकस्मात से एवं अपमृत्यु से मृत्यु हुए का श्राद्ध, शिवरात्रि
२५/०९/२०२२, रविवार सर्व पितृ अमावस, चतुर्दशी - पूर्णिमा तथा अमावस्या का श्राद्ध, अज्ञात तिथि श्राद्ध (जिन पितृओं की तिथि पता ना हो उनका श्राद्ध), महालय समाप्त
(2) पूर्णिमा को ऋषियों के निमित्त श्राद्ध, नवमी को सौभाग्यवती स्त्री के लिए, द्वादशी को यतियों, संन्यासियों के निमित्त, चतुर्दशी को शस्त्रानघात से मृतकों के लिए श्राद्ध, अमावस को सर्वपित्र एवं जिनकी तिथि नहीं मालूम हो, उनके लिए श्राद्ध किया जाता है।
(3) जिनकी मृत्यु हुई, उन्हें देश काल के हिसाब से कहीं-कहीं 1 साल बाद या मृत्यु के तीसरे या पांचवें वर्ष उन्हें पितृ में मिलाया जाता है। जिस तिथि को मृत्यु हुई, उसी तिथि को यह कार्य किया जाता है, भले ही मृत्यु किसी भी पक्ष में हुई हो।
(4) एकाधिक पुत्र होने पर यदि सम्मिलित रहते हों तो एक जगह और यदि अलग-अलग रहते हों तो सभी को अलग-अलग श्राद्ध करना चाहिए, न कि बड़े पुत्र या छोटे को, यह भ्रांति नहीं पालना चाहिए।
(5) पुत्र नहीं होने पर सगोत्री, यह भी नहीं होने पर बेटी का बेटा श्राद्ध करने का अधिकारी माना जाता है। वैसे कोई भी किसी के निमित्त श्राद्ध कर सकता है।
(6) गया श्राद्ध करने से पितरों की अनंत काल तक तृप्ति होती है तथा वंश वृद्धि भी होती है और स्वर्ग शुभ लाभ होता है जो पुत्र समर्थ होते हुए भी धन के घमंड में प्रमाद वर्ष गया श्राद्ध नहीं करता उसके पीतर गण उसके जन्म के लिए किए गए प्रयत्न को भी विफल मानते हैं तथा स्वर्ग में आंसुओं के बूंदे अपनी उष्ण स्वास के साथ पीते रहते हैं और उस वंशज के रक्त पिपासु हो जाते हैं अतः पितरों को गया क्षेत्र में जाकर अपनी परिस्थितियों के अनुसार 1,3,5,7 या 16 दिन रह कर अवश्य ही श्राद्ध करना चाहिए...
(7) पितृ पक्ष में पितृ लोक के द्वार खुलते हैं तथा सभी पितृदेव अपने-अपने पुत्रादि के घर पर जाकर स्थिखत हो जाते हैं तथा अपने निमित्त किए गए तर्पण, भोजनादि का इंतजार करते हैं। नहीं किए जाने पर रुष्ट होकर शाप देकर वापस चले जाते हैं। उनके शाप देने के कारण ही मानव जीवन में कठिनाइयों का दौर शुरू होता है। 'श्राद्ध' शब्द 'श्रद्धा' से बना है अत: इस कार्य में श्रद्धा की नितांत आवश्यकता है।
(8) भोजन में कई सब्जियों का प्रयोग नहीं किया जाता है। यहां तक कि भोजन करने वाले ब्राह्मण से पूछा तक नहीं जाता कि भोजन कैसा बना है।
(9) सबसे आवश्यक वस्तु है संकल्प। संकल्प के बगैर किया गया कार्य पूर्ण नहीं माना जाता है। यदि संस्कृत में नहीं बोल सकें, तो अपनी भाषा में ही क्रिया का उल्लेख कर जल छोड़ दें। भोजनादि के उपरांत दक्षिणा अवश्य दें। जहां भोजन की व्यवस्था नहीं हो, वहां सीधा दान (कच्चा अन्न आदि) जिसे आमान्न दान कहते हैं, दिया जाता है। वह एक परिवार के लिए एक दिन का हो, यह ध्यान रखें।।
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