शनि और केतु षष्टम भाव में युति

षष्टम भाव स्वास्थ्य, कल्याण, दैनिक दिनचर्या, ऋण, शत्रु का द्योतक है। इस भाव को आरी भाव भी कहा जाता है। यहाँ, आरी का अर्थ है शत्रु। यह भाव कठिनाइयों, बाधाओं पर भी शासन करता है।

केतु छिपी हुई चीजों को भी दर्शाता है। जबकि शनि वृद्धि का द्योतक है। इसलिए, 6 वें भाव में यह संयोजन समय के साथ जातक के दुश्मनों की संख्या को बढ़ाता है। वे जो कुछ भी कर सकते हैं उसमे वे बहुत तेजी से दुश्मन बना सकते हैं।

यह भाव बीमारी, दुर्घटनाओं, चोटों, प्रतिद्वंद्विता, मातृ संबंधों, पेट के निचले हिस्से, आंत और ऑपरेशन का भी प्रभुत्व करता है। इस प्रकार, यहाँ केतु के कारण जातक संबंधों में सीमा बना सकता है और बीमारियों के सामने आत्मसमर्पण कर सकता है। ै।


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