एकादसी का महत्व

एकादशी व्रत और महात्यम

जीवात्मा के पूर्वजन्मों कृत कर्म और संस्कार ही प्रारब्ध बनकर अगले जन्ममें सुख दुख के स्वरूपमे आते है ये तो सृष्टि का नियम है , पर कर्म का भुगतान कैसे हो वो जगतपिता की इच्छा है । कोई पुत्र कितनी भी गलती करके पिता की शरणमे आता है तो पिता उन्हें क्षमा करके प्रधान रक्षक बन जाते है । महादेव के वामदेव स्वरूप नारायण हमेशा भक्तवत्सल स्वरूप है । हमारे पास आये अनेक भक्तो को हमने एकादशी का व्रत करवाया और अहोम आश्चर्य सालोंसे समस्याग्रस्त व्यक्तिने शुभ फल पाए । एकादशी का व्रत और विष्णु सहस्त्र पाठ के साथ ॐ नमो नारायण मंत्र के जाप के अद्भुत चमत्कार हमने देखे । इनके महत्व को थोड़ा विस्तृत समझते है। janiye ekadashi fast ki vidhi and mahatav with pooja keasha hoti hai all information ekadashi  

शरीर तंत्र के चक्र मुजब हर पंद्रह दिनमे एक दिन ऐसा आता है जब शरीर को बिल्कुल खाद्य पेय ऊर्जा की आवश्यकता नही होती । हरेक मनुष्य केलिय वो दिन अलग अलग हो सकता है । जिस साधक की चेतना जागृत होती है वो उस चोककस दिन को जान सकता है पर सब केलिय ये संभव नही है । इसलिए ऋषिमुनियों ने आराध्य देव की तिथि के दिन उपवास करना प्रस्थापित किय्या । पंद्रह दिन के इस एक दिन उपवास करने से आरोग्य स्वाथ्य के लाभ के साथ साथ आंतरिक चेतना जागृत करने का ये सहज उपाय है । आकाश ब्रह्मांडसे नित्य अलग अलग कॉस्मेटिक ऊर्जा का प्रवाह अविरत शुरू रहता है ये खगोल वैज्ञानिकों ने सर्च किया । चोककस तिथि पर विविध देवताओ की उपासना का यही विज्ञान है कि उस तिथि पर ब्रह्मांडमें पृथ्वी की स्थिति एक चोककस एंगल पर होती है और उसदिन सूर्यलोक,गनपतिलोक,मनीपुरलोक या उनकी ऊर्जाशक्ति से चालित ग्रह नक्षत्र से अधिक से अधिक ऊर्जा पृथ्वी की ओर प्रवाहित होती है तब शरीर हल्का फुल्का हो और जठर खाली हो तो उनकी गर्मी से नाभी ( मणिपुर चक्र ) सक्रिय होता है और आकाशीय ऊर्जा शक्ति को अधिक ग्रहण कर सके इसलिए चतुर्थी को गणेश उपासना व्रत , छष्ठी को सूर्य , एकादशी को नारायण , पूर्णिमा को भगवती , अमावस्या को शिव पूजा व्रत उपवास का महत्व है । best astrologer website , allso.in  best and famous matrimonial website vivahallso.com

एकादशीके दिन आकाश ब्रह्मांडमें पृथ्वी की स्थिति मुजब ब्रह्मांड से भरपूर प्राण तत्व ( वायु तत्व ) पृथ्वी की ओर प्रवाहित होता है । भरपूर कॉस्मेटिक ऊर्जा का लाभ तब मिलता है जब शरीर हल्का फुल्का हो , मन मस्तिष्क एकाग्र हो इसलिए एकादशी का उपवास व्रत अति महत्वपूर्ण है । प्राण तत्व ही है जो शरीर को पुष्ट रखता है । धन , धान्य , आरोग्य , ऐश्वर्य प्राणशक्ति के आधार से ही मिलता है ।

विश्वके सभी अणुवैज्ञानिक ज्यादातर अणु प्रयोग भारतीय कैलेंडर की एकादशी के दिन ही क्यों करते है ये भी कोई महत्वपूर्ण विषय है । एकादशी के दिन अणु प्रयोग का परिणाम कोई चोककस परिणाम दाई होगा ऐसा लगता है । नासा संस्था के आकाशीय संशोधन मुजब कॉस्मेटिक ऊर्जा प्रवाह एकादशी के दिन अधिक प्रबल होता है । ashish lodhi web designer website http://adweb.rf.gd/

एकादशी तिथि ;-
वर्ष के प्रत्येक मास के शुक्ल व कृष्ण पक्ष मे आनेवाले एकादशी तिथियों के नाम, निम्न तालिका । वैदिक मास पालक देवता शुक्लपक्ष एकादशी कृष्णपक्ष एकादशी ।   kirtishin web developer website   kirtiportfolio

एकादशी ओर नारायण उपासना

 

मास वैदिकएकादशी देवता शुक्लपक्ष एकादशी कृष्णपक्ष एकादशी
कार्तिक दामोदर प्रबोधिनी एकादशी उत्पन्ना एकादशी
मार्गशीर्ष केशव मोक्षदा एकादशी सफला एकादशी
पौष नारायण पुत्रदा एकादशी षटतिला एकादशी
माघ माधव जया एकादशी विजया एकादशी
फाल्गुन गोविंद आमलकी एकादशी पापमोचिनी एकादशी
चैत्र विष्णु कामदा वरूथिनी एकादशी
वैशाख मधुसूदन मोहिनी एकादशी अपराएकादशी
ज्येष्ठ त्रिविक्रम निर्जला एकादशी योगिनी एकादशी
आषाढ़ वामन देवशयनी एकादशी कामिका एकादशी
श्रावण श्रीधर पुत्रदा एकादशी अजा एकादशी
भाद्रपद हृशीकेश परिवर्तिनी एकादशी इंदिरा एकादशी
आश्विन पद्मनाभ पापांकुशाएकादशी रमा एकादशी
अधिक पुरुषोत्तम पद्मिनी एकादशी परमा एकादशी

 

भगवान विष्णु ( नारायण ) की उपासनामे विष्णु सहस्त्र नाम पाठ श्रेष्ठ स्तोत्र है । राम , कृष्ण , बुद्ध या नारायण के किसी भी अवतार की उपासनामें विष्णु सहस्त्र नाम पाठ शीघ्र फलदायी है । नारायण की प्रसन्नता केलिए एकादशी का व्रत करना और तुलसी पूजा उत्तम है । वैष्णव कभी धन धान्य से दुखी नही होता । वैष्णव वो है जो प्राणिमात्रमे नारायण का दर्शन कर ओर हरेक जीव के प्रति सद्भाव रखे । किसी की निंदा , कुथली या अहित करने से नारायण भक्ति अफल हो जाती है । सत्य का आचरण और सद्भाव ही नारायण को प्रिय है इसलिए ही वो सत्यनारायण रूप पूजे जाते है । विष्णु सहस्त्र नाम पाठमे भगवान् के सभी अबतार चरित ओर गुणों का वर्णन हो जाता है इसलिए सभी स्तोत्र , मंत्र , कवच का पाठ एक ही सहस्त्रनाम पाठ से हो जाता है । janiye ekadashi or narayan ki upashana naranyan jaap ka bare may  

जगतपति भगवान श्री नारायण को इस सृष्टि का पालनकर्ता हैं । और ये त्रिदेवों में से एक है । व्यक्ति जन्म से लेकर मृत्यु तक जो भी सुख-दुःख अनुभव करता है वे सभी भगवान नारायण की कृपा पर ही निर्भर है, स्वभाव से शांत और आनंदमयी श्री भगवान सदैव क्षीर सागर में शेषनाग पर विश्राम की अवस्था में विराजमान होकर सृष्टि का भरण पोषण करते रहते हैं । श्री भगवान की आराधना से व्यक्ति के सभी पापों का, रोगों का नाश हो जाता है, और वह जीवन में सभी सुखों को प्राप्त करता है । अगर श्री भगवान के मूल मंत्रों की नियमित जप साधना की जाय तो भगवान नारायण अति शीघ्र प्रसन्न होकर अपने भक्तों की हर मनोकामनां पूरी करते हैं ।

मूल मंत्र :-

।। ॐ नमोः नारायणाय ।।

श्री भगवान के मूल मंत्र की साधना करने के लिए या तो श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर का चयन कर सकते हैं या अपने घर का ही पूजा स्थल । अगर में पहले से ही भगवान नारायण की फोटो या मूर्ति स्थापित है तो उसके सामने पीले वस्त्र का आसन बिछाकर कलश और दीपक स्थापना करें । अब साधक भी भगवान के सामने कुशा के पीले आसन पर बैठ जाये एवं फिर उपरोक्त मूल मंत्र की 3 माला (तुलसी की माला से ) शुद्ध होकर करें । मंत्र जप के बाद श्री भगवान की आरती करें एवं अपने कार्य की पूर्णता के लिए दंडवत लेटकर प्रार्थना करें । भगवान श्री नारायण की कृपा से साधक के सभी कार्य सिद्ध हो जाते हैं । shri padh purana ka anushaar ekadashi ka fast ka mahatav

श्री पद्म पुराण के अनुसार एकादशी के व्रत का महत्त्व_......

अश्वमेधसहस्त्राणि राजसूयशतानि च।
एकादश्युपवासस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ।।

अनेक सहस्र अश्वमेध यज्ञ तथा सेंकडो राजसूय यज्ञों को एकादशी के अनशन के सोलहवे कला इतना ही, अर्थात् ६ १/४ प्रतिशत इतना भी महत्त्व नहीं है ।
श्री पद्मपुराण जी-आदिखंड के अनुसार.....
स्वर्गमोक्षप्रदा ह्येषा शरीरारोग्यदायिनी ।
सुकलत्रप्रदा ह्येषा, जीवत्पुत्रप्रदायिनी ।।
न गंगा न गया भूप न, काशी न च पुष्करम् ।न चापि वैष्णवं क्षेत्रं ,तुल्यं हरिदिनेन च ।।

एकादशी स्वर्ग, मोक्ष, आरोग्य, अच्छी पत्नी तथा अच्छा पुत्र प्रदान करनेवाली है । गंगा, गया, काशी, पुष्कर, वैष्णव क्षेत्रों में से किसी भी क्षेत्र की तुलना एकादशी के साथ नहीं कर सकते । एकादशी को ‘हरिदिन’ अर्थात् विष्णु का दिवस संबोधित किया जाता है ।

एकादशी दो प्रकार की होती है

1. सम्पूर्णा
2. विद्धा

1)सम्पूर्णा:-
जिस तिथि में केवल एकादशी तिथि ही होती है अन्य किसी तिथि का मिश्रण नही होता उसे सम्पूर्णा एकादशी कहते है ।

2)विद्धा एकादशी भी दो होती है
1)पूर्वविद्धा
2)परविद्धा

1)पूर्वविद्धा:-दशमी मिश्रित एकादशी को पूर्वविद्धा एकादशी कहते हैं यदि एकादशी के दिन सूर्योदय काल (सूरज निकलने के बाद 1 घंटा 36 मिनट के समय तक ) में यदि दशमी का नाम मात्र अंश भी रह गया तो ऐसी एकादशी पूर्वविद्धा दोष से दोषयुक्त होने के कारण वर्जनीय है यह एकादशी दैत्यों का बल बढ़ाने वाली है अर्थात ऐसी एकादसी करने से हमारे में जो आसुरी वृत्ति ओ को बल मिलता है और पुण्यों का नाश करने वाली है पद्मपुराण में वर्णित है

वासरं दशमीविधं दैत्यानां पुष्टिवर्धनम janiya ekadashi kitna prakar ki hoti hai
मदीयं नास्ति सन्देह सत्यं सत्यं पितामहः .ll

दशमी मिश्रित एकादशी दैत्यों के बल बढ़ाने वाली है इसमें कोई भी संदेह नही है ।
2)परविद्धा: द्वादशी मिश्रित एकादशी को परविद्धा एकादशी कहते हैं *द्वादशी मिश्रिता ग्राह्य सर्वत्र एकादशी तिथि: द्वादशी मिश्रित एकादशी सर्वदा ही ग्रहण करने योग्य है... इसलिए वैष्णवो को परविद्धा एकादशी ही करनी चाहिए ऐसी एकादशी का पालन करने से भक्ति में वृद्धि होती है, दशमी मिश्रित एकादशी से तो पुण्य क्षीण होते हैं। विष्णु सहस्रनाम पाठ :- best and famous astrologer vastu shastri  website allso.in 


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