भाई दूज का क्या महत्व है?
1. पारंपरिक व पौराणिक कथाएँ
यह पर्व कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाया जाता है।
प्रचलित कथा है कि यमराज (मृत्यु के देवता) जब अपनी बहन यमुना के घर गए तो उन्होंने बहन द्वारा तिलक एवं भोजन प्राप्त किया। यमराज ने वादा किया कि जो भाई-बहन इस दिन मिलेंगी/भाई तिलक लगवाएगा, उसे यमलोक का भय नहीं रहेगा।
इसके कारण इसे ‘यम द्वितीया’ के नाम से भी जाना जाता है।
2. भाई-बहन के संबंधों का उत्सव
इस दिन बहनें अपने भाइयों के दीर्घायु, समृद्धि एवं सुकून की कामना करती हैं; भाई बहनों को उपहार देते हैं।
यह पर्व भाई-बहन के प्रेम, भरोसे, सुरक्षा और जिम्मेदारी की भावना को प्रतिष्ठित करता है।
3. सामाजिक व आध्यात्मिक दृष्टि से
सामाजिक-संस्कृतिक रूप में यह दिन परिवार के मिलन-जुलन हेतु अवसर है जहाँ भाई-बहन एक-दूसरे को याद करते हैं, मिलते हैं।
आध्यात्मिक रूप से यह पर्व “स्नेह और कर्तव्य” का संदेश देता है — बहन की प्रार्थना और भाई की सुरक्षा।
भाई दूज की पूजा-विधि एवं तिलक कार्यक्रम
मूल कदम
सुबह स्नान करें व व्रत संकल्प लें।
भाई को आमंत्रित करें; थाली सजाएं जिसमें रोली, अक्षत, कलावा, मिठाइयाँ आदि हों।
भाई को पूर्व या उत्तर दिशा में बिठाकर तिलक करें, कलावा बांधें, आरती करें व मिठाई खिलाएं।
भाई अपनी बहन को आशीर्वाद व उपहार दें।
तिलक का शुभ मुहूर्त
2025 में तिथिगत रूप से द्वितीया तिथि 22 अक्टूबर 2025 की रात 8:16 बजे से शुरू होकर 23 अक्टूबर 2025 की रात 10:46 बजे तक है।
तिलक के लिए सर्वाधिक शुभ समय शाम-पूर्वाह्न का है: लगभग 1:13 PM से 3:28 PM तक।
इसलिए बहनें इस ”अपराह्न मुहूर्त” में तिलक करने का विशेष ध्यान रखें।
कुछ विशेष बातें
यदि भाई दूर हों, तो बहन-चंद्रमा को देखकर भी उनकी लंबी उम्र की कामना करती हैं।
नाम विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग हैं: जैसे Bhau Beej (महाराष्ट्र, गुजरात), Bhai Phonta (बंगाल) आदि।